Monday, 24 February 2025

सत्य ज्ञान क्रांति का अप्रतिम योद्धा महर्षि दयानन्द सरस्वती।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी भारत के समृद्ध इतिहास के नायक इस संसार के अन्दर सबसे ज्यादा तपस्या साधना कठोर पुरुषार्थ यदि करना होता है तो ज्ञान प्राप्ति के लिए करना होता है। प्राचीन काल में जब कोई शिष्य गुरु के पास उपस्थित होता था तो समित्पानि होकर जाता था उसके बाद भी शिष्य को गुरु कहता था कि एक वर्ष बाद आना एक वर्ष श्रद्धा तप सत्य का अनुष्ठान करो और फिर जो तुम्हारे प्रश्न है अगर मै उनको जानता होऊंगा तो तुम्हे उत्तर दे दूंगा। इतना विश्वास अपने गुरु पर इतनी लगन तभी जिज्ञासु अपनी धीरज से अपनी जिज्ञासा शांत कर पाता है। संघर्ष में नही टूटना ही जीवन है। आप विचार कीजिए सूरज जब धरती पर अपनी किरणे बिखेरता है उससे पहले कितनी साधना संघर्ष करता है अपने डगमगाता नही अपने लक्ष्य से अपने कर्तव्य पथ से। इसी प्रकार जब कोई नदी पृथिवी से निकलकर प्रस्फुटित होती है बहुत संघर्ष करती है। याद कीजिए पवित्र गंगा नदी को धरती पर लाने के श्रीराम के पूर्वज श्री भागीरथी जी असंख्य वर्षों तक निरन्तर पुरुषार्थ और साधना और कठोर तपस्या निरन्तर करते रहे तभी अविरल निरन्तर बहने वाली मां गंगा को समस्त भारत का पालन पोषण करने वाली बना पाए। बालक सिद्धार्थ एक रोगी एक बूढ़े एक अर्थी को देखकर संसार के मोहपाश से मुक्त हो कर गौतम बुद्ध बन जाते है। समर्थ गुरु रामदास सावधान सुनकर विवाह मंडप से उठकर ऐसी यात्रा पर चले जाते हैं जो वास्तव में भारत के अन्दर एक स्वराज्य की क्रान्ति की ऐसी अग्नि प्रज्वलित करते है जिसकी ज्वाला में से छत्रपति शिवाजी महाराज का प्रादुर्भाव होता है जो मुगलों को छिन्न भिन्न करके हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करते है। इसी कड़ी में जब देश के अंदर धर्म के नाम पर थोथा कर्मकाण्ड, नैतिकता के नाम पर मिथ्या अंधविश्वासों का प्रचलन था। चारों ओर समाज अपनी दुर्दशा पर कराह रहा था, नारियों की दुर्दशा के उनका रुदन और चित्कार बड़े बड़े पाषाण हृदय वाले लोगों को भी विचलित कर रहा था । ऐसी ही दुरूह कठिन परिस्थितियों में राष्ट्र नायकों का जन्म होता है। महान पुरुषों का व्यक्तित्व दिव्य प्रेरक होता है। वसुंधरा पर महापुरुषों का जन्म इतिहास की विशिष्ट घटना होती है। इनके उदात्त व्यक्तित्व, उत्कृष्ट विचार तथा प्रभावपूर्ण क्रियाकलापों के कारण ये महान पुरुष न केवल समकालीन अपितु आनेवाले युग युगांतरों तक अपनी चारित्रिक विशेषताओं की छाप छोड़ जाते है। इनका व्यक्तित्व एवं इनकी विचार सम्पदा मानव जाति का पथ निर्देश करते है। भारत की उर्वरा भूमि सदा से ही ऐसी महान दिव्य विभूतियों से सुशोभित रही है। गुजराती के प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने लिखा है इतिहास की रंगभूमि पर ऐसे व्यक्ति जब जब आते है तब दूसरे तत्व पुरुषार्थ विहीन हो जाते है इतिहास क्रम रुक जाता है। समय शक्तियों का मान भूलकर दर्शकों का मन उसके आसपास लिपट जाता है। भूतकाल की रंगभूमि पर ऐसे अनेक व्यक्ति हुए है परशुराम, योगेश्वर श्रीकृष्ण चाणक्य। ऐसे ही महान पुरुषों की शृंखला में भारत के धार्मिक सामाजिक सांस्कृतिक पुनर्जागरण के पुरोधा महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की गणना ऐसे ही शलाका और प्रशंसनीय महान पुरुषों में होती है । गुजरात एक महावृक्ष है। उसकी जड़ में परमात्मा श्रेष्ठ श्रीकृष्ण का कर्मयोग छिपा हुआ है। उसकी डालियों पर महाकवि नर्मद और महात्मा गांधी की कोपले फूटी है।। गुजरात की इसी धरती ने लोककल्याण के लिए सर्वस्व त्याग करनेवाले संन्यासी दयानन्द सरस्वती जी को जन्म दिया । ऋषि दयानन्द जी का बचपन मूलशंकर जी ऋषि दयानन्द जी के बचपन का यही नाम था जब छोटे यानि कि किशोर अवस्था में थे उनके जीवन में एक अद्भुत घटना घटी जिसने न केवल उनकी मानसिक दशा में परिवर्तन किया अपितु उनके भावी कार्यक्रम की को भी सुनिश्चित कर सका। शिवरात्रि पर मूलशंकर जी ने व्रत रखा, रात्रि में शिव जी के ऊपर चूहों को उछल कूद करते देखा तो मुझे शंका हुई कि यह वो शिव तो नही है जिसकी मै कथा सुनता था कि वो सर्वशक्तिमान है, चेतन है मैने अपने पिता जी से पूछा कि पिता जी ये शक्तिमान चेतन है फिर ये चूहे को अपने ऊपर कैसे चढ़ने दे रहे है। तब पिता जी ने कहा कि कैलाश पर जो महादेव रहते है उनकी मूर्त बना कर पूजा करते है कलियुग में उस का दर्शन साक्षात नही होता है । ऐसा सुनकर मुझे भ्रम हो गया है । उसी समय मन में संकल्प लिया कि अगर ये शिव सत्य नही है एक दिन अवश्य ही अपने पुरुषार्थ और विवेक से सच्चे और सत्य शिव रूपी प्रभु के दर्शन अवश्य करूंगा। मनुष्य के विचार ही उसकी शक्ति है। महर्षि से सीखे। विचारों की यह दृढ़ता मूलशंकर के चरित्र की ऐसी विशेषता है जिसके कारण वो आजीवन अपनी आस्थाओं और मान्यताओं पर चट्टान की भांति दृढ़ और अविचल रहे। निन्दा अथवा स्तुति हानि अथवा लाभ कोई बाहरी प्रलोभन उन्हें विचलित नही कर सका। सामान्य मानव के लिए रोग शोक जरा और मृत्यु चाहे किसी भी प्रकार की उत्तेजना प्रदान न करते हो, किन्तु मनस्वी और दार्शनिक पुरुषों के लिए ये घटनाएं सदा ही असाधारणता लेकर आती है और उनके जीवन को निर्णायक मोड़ देने में कारण बनती है। इतिहास पुरुष ही कुछ विशिष्ट ही होते है जैसे महर्षि दयानन्द सरस्वती जी। संसार में आम लोगों के जीवन में मरण आदि विषय परेशान करते है लेकिन झकझोरते नही है लेकिन जो इस संसार में कुछ विशिष्ट आत्माएं जो कि दिखने में सामान्य ही होते है लेकिन जीवन में चिन्तन मनन का दृष्टिकोण दूरदर्शी होता है उन लोगों को अपनो की मृत्यु झझकोरती है। ऋषि दयानन्द सरस्वती जी के जीवन में एक रात जब वो अपने पारिवारिक उत्सव में व्यस्त थे अचानक से उनकी बहन की तबियत बिगड़ती है और मृत्यु को प्राप्त हो जाती है ऋषि दयानन्द जी अंदर तक सिहर जाते है और सोचते है कि एक दिन मै भी ऐसे ही मर जाऊंगा यही से उनके मन में वैराग्य की प्रेरणा जगी जिस वैराग्य को धारण करके जीवन के इस वास्तविक सत्य को समझ करके जन्म मरण से मुक्त हुआ जा सके। इसके उपरान्त उनके धर्मपरायण प्रिय चाचा जी का अचानक देहावसान हो जाने से अत्यंत वैराग्य हुआ कि संसार कुछ नही है। इन सब घटनाओं ने महर्षि दयानन्द जी को सत्य ज्ञान क्रांति का अप्रतिम योद्धा बना दिया। महर्षि दयानन्द जी से प्रेरणा जिसके कारण बाद के वर्षों में उनकी सत्य की साधना और तपस्या में वो ऊर्जा रही है जिसके कारण असंख्य लोगों में सत्य मार्ग में चलने का संकल्प ही नही लिया अपितु सत्य मार्ग पर चलकर व्यक्ति निर्माण, राष्ट्र निर्माण में अप्रतिम योगदान दिया। आइए संकल्प ले हम सभी महर्षि दयानन्द जी की सिद्धांतों पर चलकर सही अर्थों में ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित रहेंगे। पण्डित ब्रह्मदेव वेदालंकार

Friday, 7 January 2022

मेरे घर पर हमला हुआ लेकिन मैं सुरक्षित हूँ-पं ब्रह्मदेव वेदालंकार

मित्रो,

5 जनवरी 2022  को राज नगर एक्टेंशन स्थित मेरे हिमालय तनिष्क अपार्टमेंट पर ३ लोगो द्वारा हमला किया गया। हाथ में हथोड़ा,सरिया,आरी इत्यादि लिए हुए आये ये ३ लोगो की मंशा मुझे एवं मेरे परिवार को नुक्सान पहुंचने की एवं घर में तोड़फोड़ की प्रतीत होती है। ये ३ लोग वही है जिन्होंने साजिश के द्वारा मेरे छोटे भाई प्रेम नारायण की पिछले साल मार्च में हत्या कर दी थी। पिछले लगभग एक साल से मैं न्याय की लड़ाई लड़ रहा हूँ एवं इसमें मुझे बहुत सारे लोगो का साथ भी मिला और लेकिन  लोगो का असली चेहरा भी सामने आ गया।

Dainik Jagran :How flat was attacked
 by Alka and his family 


आज थोड़ा दुखी हूँ लेकिन निराश नहीं हूँ , भयभीत नहीं हूँ इसलिए आप सबको यह बताना चाहूंगा की किस प्रकार से विभिन्न माध्यमों द्वारा मेरी इस न्याय की लड़ाई में अड़चन पैदा की जा रही है। 

Alka and his father damaging CCTV camera before attacking house

                                                                  

मित्रो, 12 मार्च 2021 को सुबह 8  बजे मुझे एक UNKNOWN नंबर से कॉल आता है की वह प्रेम नारायण जी आर्य समाज का सेवक बोल रहा है और कहता है - "क्या आप प्रेम जी के बड़े भाई बोल रहे है " मैंने उत्तर दिया " है,बोल रहा हूँ ,बताईये " तब उस व्यक्ति ने मुझे बताया की "मैंने पंडित जी को कॉल किया लेकिन उन्होंने उठाया नहीं ,उसी नंबर से कुछ देर में कॉल आया और एक औरत जो की शायद उनकी पत्नी है बोली की पंडित जी ने आत्महत्या कर ली है और इसके जिम्मेदार तुम हो ,तुमने कराया है "। यह बात कहते हुए वो सेवक ने कहा की आप कृपया देखिये क्या हुआ है ,हमे डर लग रहा है।  मैं तुरंत राज नगर एक्सटेंशन स्थित अपने फ्लैट पंहुचा जहाँ प्रेम नारायण का निवास था तो देखा की प्रेम नारायण का शव BED पर है और उसकी पत्नी कह रही है की इन्होने आत्महत्या कर ली है। पुलिस वहां पहुंच चुकी थी। फिर प्रेम नारायण की पत्नी (अलका ) बोली की "मैंने इन्हे ६ बजे देखा तो ये सो रहे थे और ६ ३० देखा तो ये लटके हुए थे। फिर मैंने इन्हे पंखे से उतरा और बेड पर लिटा दिया "। ताज्जुब की बात ये थी की एक 95 kg के व्यक्ति को ACCUSED अलका ने अकेले कैसे उतार लिया ,न सोसाइटी के गार्ड को बुलाया और न ही पडोसी को ,न शोर मचाया। यहाँ तक की ये हो जाने के बाद मुझे भी जानकारी नहीं दी जबकि मैं महज 7 -8 km  की दूरी पर रहता हूँ।  यहाँ तक की अलका के घर वाले भी जो की फरीदाबाद रहते थे जिसका रास्ता एक ढ़ेर घंटे का है वो ७ घंटे बाद अर्थात 1 बजे दोपहर को वहां पहुंचे।  मेरे भाई का पोस्टमॉर्टेम तक नहीं हुआ और अलका के घर वाले वापिस घर भी चले गए। 

इसके अतिरिक्त मुझे यह अच्छे से जानकारी थी की अलका और मेरे भाई प्रेम नारायण का झगड़ा होता था। अलका एवं उसके परिवार वाले चाहते  थे की प्रेम नारायण अपने बड़े भाई भाभी से नाता तोड़ दे , फ्लैट बेच दे और जो पैसा मिले उसे FD करा दे और किराये पर फरीदाबाद रहे जिसके लिए मेरा भाई राजी नहीं था। यह बात वो हजार बार बता चूका था और हम सबका यही प्रयास था की चाहे कानूनन या आपसी सहमति से सुलह हो जाये और जीवन सुखी हो जाय।   किन्तु मेरे भाई के प्राण चले गए

ये सब सोच कर मैं शाम को उसी दिन (12 मार्च) को पुलिस स्टेशन गया और अलका एवं उसके परिवार के खिलाफ कंप्लेंट दी। पुलिस ने कंप्लेंट ली लेकिन कोई FIR नहीं करी। जब ३ दिन मैं पुलिस स्टेशन के चक्कर काटता रहा तब FIR हुई वो भी मर्डर की नहीं आत्महत्या की। 

जब मैंने सबूत दिए ,गवाहों ने गवाही दी तब जाकर अलका को 31 मार्च को गिरफ्तार किया गया।  लेकिन ये गिरफ्तारी इतनी आसान नहीं थी 

मित्रो ,प्रेम नारायण के जाने के बाद जब मैंने अलका के घर वालो को फ़ोन किया की वो अलका को भेज दें जिससे यज्ञ आदि रस्मे की जा सके तब उसके घर वाले बोले की हम लोगो को आपसे कोई मतलब नहीं रखना और हम किसी भी कार्यक्रम में नहीं आएंगे।  लेकिन ३१ मार्च को ये सब लोग उस मेरे फ्लैट में आये जहाँ प्रेम नारायण रहता था ,बिना मुझे बताये। घर में गृह प्रवेश की पूजा करी और उस घर पर कब्जा स्थापित करने का प्रयास किया ,लेकिन ईश्वर की कृपा थी की सूचना पुलिस को मिल गयी और ये लोग गिरफ्तार हो गए,। 

जिला अदालत में जमानत अलका की ख़ारिज हो गयी ,और ६ महीने बाद माननीय हाई कोर्ट के द्वारा अक्टूबर में अलका को जमानत मिली। लेकिन नवंबर,दिसंबर में न आकर जनवरी में अलका और उसके भाई भारत शर्मा और मिट्ठन लाल शर्मा ने मुझे पर एवं परिवार पर हमला किया। लेकिन मैं फ्लैट में उस दिन उपस्थित नहीं था ,परिवार के साथ आश्रम गया हुआ था ,इसलिए मुझे क्षती तो नहीं हुई लेकिन मेरे घर के दरवाजे तोड़कर ,मुझे हानि पहुंचाई गयी। लेकिन इनका मुझे डरने का प्रयास सफल होने वाला नहीं है। 

 जैसा मैंने कहा की मैं दुखी हूँ ,तो मैं क्यों दुखी हूँ आपको बताता हूँ :-

1 मैं एक किसान परिवार से आता हूँ , पिता जी के निर्देश अनुसार एवं मेरे दादा जी स्वामी सत्यानंद जी के आशीर्वाद से मैंने एक एक भाई को गांव से लेकर आया ,गुरुकुल आदि माध्यम से सब भाइयो को पढ़ाया जो की मेरा धर्म है। प्रेम नारायण को भी गुरुकुल कांगरी के माध्यम से पढाई कराई एवं वह अपनी मेहनत से  योग्य हुआ। आज इतनी बातें लोग कहते है, तो क्या भाई को पढ़ाना गलत था ?

२ शादी गलत जगह हो जाने से क्या भाई को छोड़ दिया जाता है ? जिसको अपने बच्चे की तरह रखा उसे हम भूल जाएं 

३ क्या मेरे छोटे भाई की बेटी जो अभी अलका एवं उसके परिवार के कब्जे में है उसको सुरक्षित भविष्य देने की मेरी सोच गलत है ? लोग कहते है आप उसे न लें , तो क्या वो बच्ची इन हत्यारो के हाथ safe है ?उसे अपने हाल पर छोड़ दें ,यही धर्म है ???

4  क्या मेरा न्याय के लिए लड़ना व्यर्थ है ? बेवकूफी है ? कुछ लोग कहते है की भाई वापिस नहीं आएगा ,केस वापिस ले लीजिये, क्या मुझे सही में केस वापिस ले लेना चाहिए ?

5  पुलिस को जिस घर में जाकर जांच करनी चाहिए थी वहां वो एक बार भी नहीं गयी ,जिससे पूछताछ करनी चाहिए थी नहीं करी , तो क्या पुलिस से बार बार निवेदन करना गलत है ?

6  पिछले ८ महीने में ऐसे कई सबूत मिले जिससे स्पष्ट होता है की ये साजिश करके हत्या की गयी है ,तो क्या मैं वो सब भूल जाऊ,ignore कर दू??

7 आज कुछ लोग कहते है की आप नहीं लड़ पाएंगे ,आप अपना समय और पैसा व्यर्थ कर रहे है।  तो क्या कोई भी आये और मेरे परिवार को मार के चला जाये और मैं बैठा रहू ,कुछ न करू ?


पुलिस का सहयोग तो नहीं मिला लेकिन पिछले १ साल में ऐसे लोग जरूर मिले जो हतोत्साहित करते रहे की कुछ नहीं होगा ,छोड़ दीजिये ,चुप रहिये। कुछ पुलिस वाले ऐसे मिले ,कुछ वकील 

मैं इस रस्ते पर कभी गया तो नहीं ,कभी कोर्ट कचेहरी देखि तो नहीं लेकिन हार नहीं मानूंगा , लडूंगा न्याय के लिए। जितने हमले होने है हो जाये ,मरना है तो मर जायेंगे लेकिन मरने के डर से युद्ध छोड़ दें ऐसा कायर नहीं हूँ मैं। कुछ लोगो ने साथ भी दिया और ऐसे कठिन समय में दिया उसके लिए मैं आभारी हूँ। 

जिन लोगो ने मेरे भाई की हत्या की ,फ्लैट और पैसे के लिए।।। वो लोगो को दंड मिलना चाहिए। 

मित्रो,मुझ पर हमला करके मुझे डराने  का प्रयास जरूर हुआ है लेकिन स्वामी दयानन्द के शिष्य है हम ,वीर राम कृष्ण  के वंशज है डरेंगे नहीं ,घबराऊँगा नहीं, जब तक हूँ लडूंगा न्याय के लिए |

जो सहयोग कर सके या कर रहे है उनका हार्दिक धन्यवाद ,आशा आपका सहयोग बना रहेगा एवं ये न्याय की लड़ाई चलती रहेगी 

इसलिए मैं दुखी तो हूँ लेकिन निराश नहीं हूँ ,भयभीत नहीं हूँ

बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,

आग लगाकर जलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा। 

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।   

- भारत रत्न अटल बिहारी जी द्वारा रचित कविता के अंश 


मित्रो , मैं सुरक्षित हूँ ,सतर्क हूँ और ऐसे हमलो से डरने वाला नहीं हूँ क्योकि मुझे विश्वास है की आप मेरा साथ देंगे ,आप न्याय का साथ अवश्य देंगे 

Friday, 25 January 2019

गणतंत्र दिवस

मित्रों ये गणतंत्र है,इसके  आदि प्रणेता मनु है।


ये भारत की शान है,हम सबकी पहचान है।


हम कपिल,कणाद,गौतम की सन्तान है।


हमारे प्रेरक स्वयं राजा भरत है,जिनसे भारत की पहचान है।


ये भूमि बड़ी उर्वरा है दिव्य है,महान है।


क्योंकि हरिश्चंद्र युधिष्ठिर, श्रीराम, श्रीकृष्ण  की पुण्यभूमि


आर्यावर्त महान है।


इसकी रक्षा करने को यदि शीश कटाने पड़ जाए


इसकी रक्षा करने को यदि स्वयं को अर्पण करना पड़ जाए


तो मातृभूमि की रक्षा में तन मन धन न्यौछावर कर देंगे


लेकिन तिरंगे की शान  इसकी आन को धूमिल 


नही होने देंगे चाहे खुद मिट्टी में मिलना पड़े।


आओ चले भगत,बिस्मिल,खुदीराम बोस की राहें


ताकि फिर नेता जी को ना कहना पड़े तुम मुझे खून......


ताकि फिर किसी 'आज़ाद' को आज़ादी के लिए कोड़े ना लगे


ब्रह्मदेव की ओर से गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं


करे स्वीकार, सादर आभार सहित


द्वारा..पं ब्रह्मदेव वेदालंकार


Thursday, 24 January 2019

निर्धनता बुरी नही धन का नशा बुरा है

कहा गया है कि धन में लक्ष्मी का वास होता है। धन का महत्व आज के समय में ही नहीं, बल्कि प्राचीन समय से रहा है। धन के बिना न तो कोई यज्ञ होता है न ही कोई अनुष्ठान। जीवन निर्वाह धन के बिना नहीं हो सकता। आपने अक्सर ही लोगों से सुना होगा कि पैसे में बहुत ताकत है और यह कि पैसा है तो सब कुछ है! इन कथनों में कुछ हद तक सच्चाई भी है। यह सही है कि धन के बिना हमारा काम नहीं चल सकता, पर ऐसा कतई नहीं है कि धन ही सब कुछ है। थोड़ा-बहुत धन हमें चाहिए, पर जितना चाहिए उसी के पीछे यह सब अनर्थ नहीं हो रहा। अनर्थ वे लोग ही करते हैं जिनके पास ‘चाहिए’ से अधिक धन है। यहां सवाल यह उठता है कि चाहिए से अधिक धन का लोग क्या करते हैं?

आज धन बल पर धर्म का व्यवसायीकरण हो रहा है। संतगण धन-संचय और वैभवशाली जीवन-शैली के नए प्रतिमान गढ़ रहे हैं। ऐसे में निराकार ईश्वर के आराधक संत कबीरदास याद आते हैं। कबीर ने बड़े सहज भाव से परमेश्वर से यह मांग रखी- ‘साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय॥’ यानी वह जनसाधारण को परिश्रम से उतने ही धन उपार्जन के लिए कह रहे हैं, जितने से उसके दैनिक कार्यों की पूर्ति हो जाए। आवश्यकता से अधिक धन की इच्छा ही तृष्णा का रूप धारण कर लेती है और अंततोगत्वा यह तृष्णा ही व्यक्ति के नैतिक पतन का कारण बनती है।

हमारी संस्कृति में धन के अभाव को बहुत बड़ा अभिशाप माना जाता है। जहां यह सत्य है कि दूसरों की भलाई के कार्यों के लिए धन की आवश्यकता होती है, वहां यह भी सत्य है कि धन की बुराइयों को अपनी ओर खींचने की क्षमता अकथनीय है। इस दुविधा को दूर करने के लिए हमारी संस्कृति ने एक मार्ग सुझाया है और वह है त्याग। अपने शरीर को स्वस्थ रखने व दूसरों की भलाई के लिए धन की सहायता से उचित साधन जुटाए जाएं, लेकिन उनका उपभोग त्याग की भावना से किया जाए।

यह सच है कि धन मूल्यवान है। उसकी सभी को जरूरत है, पर उसको सब कुछ मान लेना स्वस्थ मन-मस्तिष्क का परिचायक नहीं कहा जा सकता। इसी मान्यता के प्रभाव का परिणाम है कि आज जीवन के लिए धन नहीं रह गया है, धन के लिए जीवन हो गया है। हर आदमी भाईचारा, सुख-शांति व ईमान खोकर जिस किसी भी तरह से धन कमाने के पीछे पड़ा है। इससे दुनिया में धन नहीं बढ़ा है बल्कि धन का नशा बढ़ा है, धन के लिए पागलपन बढ़ा है। इससे दुख बढ़ा है, अशांति बढ़ी है, घमंड बढ़ा है और शैतानियत बढ़ी है।

वेद कहता है- पैसा कमाओ परंतु बहुत नहीं, जितनी जरूरत है उतना कमाओ। कुछ दान भी दो कुछ खाओ-पियो और ईश्वर का ध्यान, भगवान का भजन करो। धन कमाने के लिए एक दिन में अधिकतम 8 घंटे का समय खर्च करना चाहिए, थोड़ा-थोड़ा करके धीरे-धीरे पैसा कमाओ, धीरे-धीरे जमा करो जिससे अपना जीवन ठीक से चलता रहे। अत्यधिक धन की चाह को अपने दिल में कभी जड़ मत पकड़ने दो। याद रखिए कि आपके दोस्त, परिवार के सदस्य और आपकी सेहत पैसे से कहीं ज्यादा अनमोल हैं।
निर्धनता बुरी है पर धन का नशा उससे भी बुरा है।

Wednesday, 16 January 2019

मकर संक्रांति

नमस्ते जी।इस मकर संक्रांति मैंने यह कुछ प्रभु को समर्पित करते हुए कविता लिखी है।आप भी आनंद लेऔर अपना स्नेह प्रदान करे।
हे मेरे वरेण्यम प्रभु वरदान दो,
सूर्य के पथ पर चलू निरन्तर,
ज्ञान दो सद्ज्ञान दो मेरे प्रभु
जीवन में दक्षिणायण ना आये कभी
उत्तरायण में बीते जीवन की घड़िया।
उत्तरायण के मार्ग पर चलता हुआ
सत्य की जय करता हुआ सदा,
क्योंकि सत्य भी आप ही है
और नारायण भी आप ही है।
आपका अटल पथ उत्तरायण है।
उत्तरायण के पथ पर चलता हुआ
विचलित ना हूँ कभी दक्षिणायन की बाधाओं से।
जीवन का अज्ञान तिमिर भस्म हो आपके प्रकाश से।
आपके दिखाये पथ पर चलकर
जीवन के संग्राम में बड़ो के बताए
मार्ग का आरोहण कर के
देवत्व का वरण करु
मैं ब्रह्म हूँ विजयी रहूँ, देवत्व के मार्ग में।
विजयी रहूँ, विजयी रहूँ देवत्व के मार्ग में।
द्वारा    पं ब्रह्मदेव वेदालंकार